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Adarsh Balak
Shastri Chatursen
# आदर्श बालक, ## वीर बादल, तेरहवीं शताब्दी बीत रही थी। निर्दयी और इन्द्रियलोलुप पठान अलाउद्दीन खिलजी भारत का सम्राट था। उसने अपनी दुर्धर्ष सेना के बल पर राजपूताना को कुचल डाला था, और अब वह राजपूताने की बची-खुची आबरू को लूटने के लिए दल-बल लेकर चित्तौड़ पर चढ़ आया था। चित्तौड़ पर दुर्भाग्य उदय हुआ था। इस बार उसका इरादा चित्तौड़-विजय का न था, प्रत्युत चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी को हरण करने का था। चित्तौड़ की आन्तरिक व्यवस्था अच्छी न थी। राणा लक्ष्मणसिंह नाबालिग थे और उनके चाचा भीमसिंह चित्तौड़ के कर्ता-धर्ता थे। पद्मिनी भीमसिंह की पत्नी थी। वह पद्मराग-मणि के समान सुन्दर और कान्तिवाली थी। उसके सौन्दर्य की तारीफ राजपूताने में फैल चुकी थी, और सौन्दर्य-लोलुप अलाउद्दीन पूरी शक्ति से उस सौन्दर्य-कुसुम को लूटने चित्तौड़ पर चढ़ दौड़ा था। किला चारों ओर से घिरा हुआ था और किसी भी आदमी का किले से बाहर जाना या बाहर से भीतर आना सम्भव न था। यह समाचार सुनकर प्रत्येक राजपूत का मानो रक्त खौल उठा। उन्होंने तलवारें खींच लीं और भाँति-भाँति के कुवाक्य दूत और सुलतान को कहे। प्रत्येक राजपूत इस अपशब्द के बदले प्राण देने को तैयार था, पर राणा भीमसिंह गम्भीर चिन्ता में निमग्न हो गए थे। उनके ऊपर चित्तौड़ की रक्षा एवं हजारों राजपूतों के जीवन-रक्षण का दायित्व था। उन्होंने सोचा—क्या सर्वनाश से बचने के लिए यह अपमान सह लिया जाए? उन्होंने स्त्रियों से, सरदारों से, भाई-बन्दों से और दरबारियों से परामर्श किया और रानी पद्मिनी से भी सब हकीकत कह दी। रानी ने साहसपूर्वक कह दिया कि यदि मेरा यह अपमान करके वह दैत्य टल जाए और चित्तौड़ की हजारों बहू-बेटियाँ विधवा होने से बच जाएँ, तो मैं अपनी आबरू का बलिदान देने को तैयार हूँ; परन्तु प्रत्यक्ष नहीं—दर्पण से ही वह पशु मेरी छवि की एक झलक देख सकता है। राणा भीमसिंह ने सभासदों को सब ऊँच-नीच समझाकर अन्त में प्रस्ताव की स्वीकृति दूत को दे दी। उन्होंने यह शर्त रखी कि सुलतान अकेले, निःशस्त्र, किले में आएगा और दर्पण में महारानी की एक झलक देखकर तुरन्त लौट जाएगा, तथा तुरन्त ही चित्तौड़ का घेरा उठा लेगा। अलाउद्दीन ने राणा की इस उदारता की बड़ी तारीफ की और मित्रता की बहुत लम्बी-चौड़ी बातें राणा के पास भेजीं। ठीक समय पर वह निःशस्त्र, अकेला, किले में आ पहुँचा। अलाउद्दीन का प्रताप दुर्निवार था, पर वह विश्वासी व्यक्ति न था। किले के प्रत्येक सजग पुरुष ने इसे राजपूती अपमान समझा हुआ था। परन्तु राणा अपने विचार पर अड़े थे। यह गम्भीर घड़ी थी—चारों ओर महलों में एक भयावह गम्भीरता छाई हुई थी। अलाउद्दीन ने राणा की इस उदारता की बड़ी तारीफ़ की और मित्रता की बहुत लम्बी-चौड़ी बातें राणा के पास भेजीं। ठीक समय पर वह निःशस्त्र, अकेला, किले में आ पहुँचा। अलाउद्दीन का प्रताप दुर्निवार था, पर वह विश्वासी व्यक्ति न था। किले का प्रत्येक सजग पुरुष इसे राजपूती अपमान समझे हुए था; परन्तु राणा अपने विचार पर अड़े थे। यह गम्भीर घड़ी थी—चारों ओर महलों में एक भयावह गम्भीरता छाई हुई थी। राजपूत बड़ी-बड़ी काली मूँछों के बीच दाँतों पर दाँत दबाए, बड़े-बड़े हाथ कमर पर, तलवारें सँभाले, अपमान से दग्ध अंग लिए खड़े थे। सुलतान संयम, धीरज, साहस और उत्सुकता की मूर्ति बना धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। राणा ने भी यह फटने पर उसका स्वागत किया था। राजपूतों के धर्म पर उसे भरोसा था। वह निःशस्त्र तथा अकेला था। वह अपने घोड़े पर सवार था। उसकी बायीं ओर राणा चुपचाप एक घोड़े पर सवार आगे बढ़ रहे थे, और पीछे चुने हुए सवार थे। सुलतान अपनी मित्रता और प्रसन्नता प्रकट करने के लिए बहुत-सी बातें करता जाता था। जनानी ड्योढ़ी पर सब घोड़ों से उतर पड़े। वे उन सीढ़ियों पर चढ़े, जहाँ किसी यवन के पाँव नहीं पड़े थे। राजपूत क्रोध से एवं बाँदियाँ भय से थर-थर काँप रही थीं। सन्नाटा था। बिरद गाने वाले चुप बैठे थे। दासियाँ मुँह पर घूँघट डाले सिमटी खड़ी थीं। नौबतखाने के नक्कारे ठण्डे पड़े थे। सुलतान ने कहा—“सच्चे राणा! आज से हम दोनों दोस्त हुए न? कहिए!” महाराणा ने खिन्न मन होकर धीरे से कहा—“सुलतान! यदि यही इच्छा है, तो मैं वचन देता हूँ कि राजपूत हमेशा सच्ची दोस्ती निभाएँगे।” “इसका मुझे पूरा भरोसा है। आप देखते हैं कि आप पर यक़ीन करके खाली हाथ आपके किले में आ गया हूँ। उम्मीद है, आप भी मुझ पर भरोसा करेंगे।” राणा ने गम्भीर स्वर से कहा—“तो क्या सुलतान मित्रता की ओर इतना कदम उठाकर भी वह अपमानजनक काम करने का इरादा रखते हैं, जो राजपूतों के लिए बिलकुल नया है?” “यक़ीन रखिए, महाराणा, मेरी नियत कुछ बुरी नहीं। जैसा हम लोगों में कौल-करार हुआ है, उसके पूरा होते ही मैं तुरन्त दिल्ली लौट जाऊँगा।” राणा ने ठण्डी साँस लेकर एक बार सरदारों की ओर देखा—वे सीधी आँखें किए खड़े थे। फिर उन्होंने चाँदी की भाँति सफ़ेद महलों के आकाश को छूने वाले सुनहले कंगूरों को देखा, जो सूर्य की धूप में चमक रहे थे। तब सूर्यवंश के उस अधिकारी ने एक ठण्डी साँस ली और कहा—“तब आइए, राजपूत अपनी बात पूरी करेंगे।” दोनों आगे बढ़े। दो कदम बाद सुलतान ठिठककर खड़ा हो गया। उसने देखा—सामने पूरे कद के आईने में वह अलौकिक सुन्दरी, जैसे रत्नों से जड़ी तस्वीर हो, लाज से सिर नवाए खड़ी है। एक झलक सुलतान ने देखी, और वह झलक देखते ही वह स्तब्ध-सा रह गया। सुलतान ने विस्मित होकर कहा—“इस सौन्दर्य की मैंने कल्पना भी नहीं की थी।” महाराणा ने कठोर स्वर में कहा—“राजपूतों का वचन पूरा हुआ। अब सुलतान को अपना वचन निभाना चाहिए।” सुलतान चौंका और सोते से जागे हुए मनुष्य की भाँति अपने आप में आया। फिर बोला—“वाह! आज आपकी दोस्ती पर मैं रीझ ही गया, महाराणा। दूसरे शब्दों में आपको मुबारकबाद देता हूँ। आपकी महारानी बेमिसाल हैं। इंसान से इतनी ख़ूबसूरती नहीं हो सकती।” राजपूत वीर ज्यों-के-त्यों रहे। राणा ने स्थिर होकर कहा—“राजपूती मर्यादा यही है। सुलतान, इसे प्रतिष्ठित मेहमान की भाँति हम बाहर की ड्योढ़ी तक पहुँचाएँगे; परन्तु सुलतान अपना वचन न भूलें।” राणा ने स्थिर होकर कहा—“राजपूती मर्यादा यही है। सुलतान को प्रतिष्ठित मेहमान की भाँति हम बाहर की ड्योढ़ी तक पहुँचाएँगे; परन्तु सुलतान अपना वचन न भूलें।” यह कहकर राणा ने अपनी शामियानी उठाई। सुलतान ने वापस लौटने की बात कही। वे धीरे-धीरे चुपचाप लौट रहे थे। सिर्फ़ घोड़ों की टाप सुनाई दे रही थी। दोनों चुप थे। राणा उस अपमान की बात सोच रहे थे, जो अभी हो चुका था, और सुलतान उस बात की, जो वह अभी करने वाला था। फाटक आ पहुँचा। राणा ने कहा—“मैं सुलतान के कष्ट करने के लिए क्षमा माँगता हूँ।”
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